Rangoli – रंगोली

रंगोली…

रंगोली सारे भारत में अलग अलग प्रांतों के रीत रिवाजों और वहां की विशेष सांस्कृतिक शैली के अनुसार सजाई जातीं हैं। कहीं पे आटे से कहीं चावल के रंग किये हुए पाउडर से कहीं रेत से कहीं पत्थर के पाउडर से कहीं गोबर से कहीं फूलों और पत्तियों से।

सब जगह की रंगोली सुन्दर. मनभावक और लुभावनी होतीं हैं। पर महाराष्ट्र में जो रंगोली बनतीं हैं उनका कोई जबाव नहीं हैं। रंगोली बनाने की प्रतिस्पर्धाएं तक आयोजित होतीं हैं यहां।

अभी कुछ दिन पहले मैंने श्री मनोज पाटिल द्वारा बनाई गयीं रंगोली पेंटिंग्स,जो एकदम जीवंत लगतीं हैं, फेसबुक पे पोस्ट की थीं। आपने देखीं होंगी।

आज जो मैं पोस्ट कर रहा हूँ वो आपको पकवानों से भरी थाली लगेगी देखने में पर ये एक रंगोली है। एक थाली जो अधूरी है रंगोली बनने की प्रक्रिया में है और दूसरी थाली अपने आप में सम्पूर्ण है। कलाकार की कल्पना को जैसे पंख लग गएँ हो। वो तरह् तरह के रंगों का इस्तेमाल करके हमें सचमुच एक भरी हुई थाली तक ले गया है। मन करता है उसके हाथ चूम लूं।

tahli ki rangoli bante hue  Thalli ki rangoli

नमन करता हूँ उस कलाकार को और उसकी कला को…

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MADHUBALA…

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MADHUBALA....

“जब कश्ती साबित -ओ- सालिम थी
साहिल की तमन्ना किसको थी ?
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती में
साहिल की तमन्ना कौन करे ?”

“Filmdom’s most captivating star, around whom a thousand fantasies were spun, remained sadly bereft of her own personal happiness…

Her name was already synonymous with grace and loveliness, By the time she died, it had become synonymous with pain and misfortune.

[From ” I want to Live” -The story of Madhubala-
by Khatija Akbar.]

Finished reading the book before I went to sleep past midnight
yesterday and the hangover still remains of the most beautiful
lady of Silver Screen who saw all the shades of life -mostly sufferings
and pain- before she died young at the age of 36.

What a tragedy…

Madhubala’s screen journey through her beautiful songs.

केंद्रीय विद्यालय संगठन – और मैं…

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७ अक्टूबर…

आज के ही दिन १९७० में मेरी नियुक्ति केंद्रीय विद्यालय संगठन में हुई थी.

देखते देखते 45 साल गुज़र गए और अब तो रिटायर हुए भी समय हो चूका है. इन सारे वर्षों का पूरा लेखा जोखा तो लिखना मुश्किल है पर बहुत सी सुखद यादें है जो आज भी मन को गुदगुदा जाती हैं. बहुत लगन मेहनत और इमानदारी से काम किया और जहाँ तक हो सका सबकी मदद भी की.

आज भी मुझे अपने वो पुराने साथी याद आते हैं जो अक्सर कहा करते थे की शर्माजी क्यों इतनी मेहनत करते हो कोई पदमश्री तो मिलनी नहीं है. पर मुझे वो सब कुछ मिला जिसकी मैंने उम्मीद भी शायद नहीं की थी. अपने सहकर्मियों का विश्वास और आदर. पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुश्किल लगता है की कैसे पल पल करके मैंने काम सीखा और न सिर्फ सीखा बल्कि उसे अपने सेवा काल में आगे भी बढाया और मैं अपने इसी काम की वजह से पहचाने जाना भी लगा. न सिर्फ आयुक्त और अन्य अफसर बल्कि मंत्रालय तक में भी लोग मुझे पसंद करने लगे.

कई बार काम करते करते रात के ११-१२ भी बज जाते थे और फिर एक नयी सुबह, वही लगन, वही जोश और कुछ हासिल करने की तमन्ना लेकर मैं बढ़ता रहा. अपनी ज़िन्दगी के बेहतरीन वर्ष मैंने केंद्रीय विद्यालय संगठन में बिताये. आज इतने वर्ष के बाद भी बहुत से पुराने मित्र और सहकर्मी हैं जिनसे मेरा संपर्क निरंतर बना हुआ है.

अपने इन्ही वर्षों की मशक्कत, खट्टी मीठी यादों को शब्दों में पिरोने का प्रयास जारी है . पूरा होने पर अवश्य शेयर करूँगा…

अमवा की डाली बोले काली कोयलिया -आजा बलमवा हमार आजा बलमवा हमार’…

अमवा की डाली बोले काली कोयलिया -आजा बलमवा हमार आजा बलमवा हमार’…

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आजकल बाज़ार तरह तरह के आमों से पटे पड़े हैं. अल्फांजो,दसेरी,सफेदा,लंगड़ा,बादामी,चौसा, तोतापरी और न जाने कितनी ही किस्मों के आम. भारत तो वैसे ही आम का जन्मदाता है, सारी दुनियां में आम यहीं से गया फल और उसके पौधों के रूप में. केरल से लेकर हिमालय के घाटिओं और पूर्व से पश्चिम तक इस फल की अनेक प्रजातियाँ देखने को मिलती हैं. कहते हैं सब मिलाकर इसकी १४०० किस्में हैं.

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भगवान् गणेश के हाथ में जो आम है वो संपूर्ण संतुष्टि का प्रतीक है. भगवान् बुध को ज्ञान प्राप्ति भी आम के पेड़ के नीचे ही हुई थी. जैन धर्मं में भी देवी अम्बिका को एक आम के पेड़ के नीचे ही बैठे दिखाया जाता है. कालिदास द्वारा ४ थी शताब्दी में रचित साहित्य में भी आम का वर्णन है. तीसरी शताब्दी और ७वि शताब्दी इसा पूर्व में इस फल का जायका सिकंदर और हुआन सांग ने भी किया ऐसा इतिहास के पन्नो में दफ़न हैं. मुग़ल सम्राट अकबर ने दरभंगा में इसके एक लाख पौधे लगाए। उस बाग़ को आज भी लाखी बाग़ के नाम से जाना जाता है।

हमारी संस्कृति में आम कुछ इस तरह रच बस गया है की जन्म से लेकर, विभिन्न रीत रिवाजों, पूजा पाठ, और जीवन के अंत तक में इसकी या इससे जुडी चीज़ की ज़रुरत पड़ती है. देवी सरस्वती और माघ के महीने में होने वाली चंद्रमा की पूजा में आम के बौर चढाने का चलन है. आम के पत्तों की बन्दनवार हर हिन्दू के घर के दरवाजे पर कुछ विशिष्ट अवसरों पर लगाई जाती है चाहे वो पोंगल हो,दीपावली हो, गणेश चतुर्थी हो सभी में इसका प्रयोग इश्वर के आशीर्वाद और शांति के द्योतक हैं. तेलगु, कन्नडा और तमिल नव वर्ष में पकने वाली “उगाडी पच्चाड़ी ” में आम के टुकड़े काट कर डालने की प्रथा है. इन्ही आम के पत्तों और लकड़ी का प्रयोग पूजा हवन आदि में होता है, शादी ब्याह इसके बगेर अधूरे हैं.

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हाथों में रची मेहँदी- सिल्क और कांजीवरम की साडिओं- कश्मीरी शाल और येहाँ तक की रंगोली तक में आम के विभिन्न डिजाईन देखने को मिलते हैं. आम चटनी, अचार, आम पापड़, आम रस, पके हुए आम और आम का पना आदि अपनी विभिन्न शैलिओं और स्वादों में किसी भी जुबां और मुहं में पानी लाने के लिए काफी हैं.

आम की लकड़ी के दरवाजे और ताबूत और येहाँ तक की अंत समय चिता की अग्नि भी आम की लकड़ी से जलाई जाती है.

ओ सजना बरखा बहार आयी रस की फुहार लाई …

ओ सजना बरखा बहार आयी रस की फुहार लाई …

चैत, बैसाख और जेठ. वर्ष के सबसे गरम और लम्बे दिन. तपती हुई फटी सी धरती. सूखे पोखर, ताल और तलैयां. हाँफते हुए पक्षी और जानवर. लम्बी सुनसान पग डंडियाँ और सड़कें. ये सब बीत गया सा लगता है. अब बरखा ऋतू का आगमन हो रहा है. पेड़,पौधे,पशु,पक्षी और स्त्री पुरुष सभी इनके स्वागत को तत्पर बैठें हैं.

बड़े इंतज़ार के बाद ये देवीजी, अपने पूरे साज़ श्रृंगार के साथ, इठलाती, मटकती अपने एक हाथ से अपनी लम्भी घनी और काली चोटी घुमाते हुए हुई येहाँ आ पहुंची हैं. धीमे धीमे ये देश के अधिकतर हिस्सों में अपना आँचल फैला लेंगी. पहले मंद मंद फिर घनघोर हवाएं चलेंगी और उनके साथ आयेंगे उमड़ते घुमड़ते बादल, धुआं धार बूँदें पड़ेंगी, धरती की प्यास बुझेगी. सारे पर्वत, विशेषकर पश्चिमी और पूर्वी घाट-अरावली-निलगिरी-शिवालिक-सतपुरा -विन्ध्याचल और हिमालय, जो वैसे ही अत्यंत सुन्दर हैं और जहाँ तहां जंगलों से ढके हैं, और भी सुंदर हो जायेंगे. उत्तर पूर्वी भारत के मैदान और घाटियाँ में लगेगा जैसे किसीने गहरे हरे रंग की स्याही बिखेर दी हो. सूखे बंजर पहाड़ों पर छोटी बड़ी जल धाराएं और झरने फूटेंगे. नदी,नाले सब उफ्नेंगे. समुन्द्र में ऊंची ऊंची लहरें उठेंगी. नए अंकुर फूटेंगे और साथ ही नए जीवन की शुरुवात होगी. केंचुए, मेढक, झींगुर, रेंगने वाले और प्राणी, जो अब तक ज़मीन के अन्दर छिपे बैठे थे, बाहर निकलेंगे. वातावरण उनकी और उनके साथ और बहुत से पक्षिओं की आवाजों से संगीतमय हो जाएगा. आकाश में विहंग दल उड़ते दिखाई देंगे. झीलों के नजदीक बगुले और सारस फिर लौटेंगे रास लीला करने. उन्हें देख युवक युवतीयां भी कहाँ पीछे रहने वाले हैं, झुरमुट और पेड़ों से ढकी बेचों पर उनकी भी प्रेम लीला चलेगी. जनम जन्मान्तर से ये होता आया है.

हवा के पंखों पर सवार मल्हार, कजरी और लोक गीतों की स्वर लहिरियां सुनायी देने लगेंगी. नए गीत बनेंगे और नया साहित्य रचा जाएगा. सब कुछ कोलाहल मय, रोमांचित और रोमांस मय लगने लगेगा. एक पल को आँख बन्द कर कल्पना करें तो ऐसा लगेगा मानो बादलों से आच्छादित आसमान के नीचे एक लम्बी नदी पर नाव चलाता एक मांझी किसी लोक गीत को गुनगुनाता चला जा रहा हो – बहुत खुश है, नदी पार कर अपनी प्रेयसी से जो मिलेगा.

वैसे तो सारी दुनियां में पर विशेषकर भारत में वर्षा ऋतू का बहुत महत्व है. येहाँ वर्षा केवल ऋतू नहीं है बल्कि इसे एक उत्सव की तरह मनाया जाता है. गाना-बजाना, ढोल-नगाड़े, लोक नृत्य, लोक गीत, राग मल्हार-कजरी और बहुत से राग इसी वर्षा ऋतू की देन हैं. भारत में जितना साहित्य लिखा गया वो ग्रीष्म और शीत ऋतू पर बहुत कम है पर वर्षा ऋतू पर सबसे ज्यादा. प्राचीन काल से ही इसका वर्णन हमारे साहित्य में मिलता है. फिर चाहे वो महाभारत हो, रामायण हो, कालिदास द्वारा रचित मेघदूत हो या अन्य कोई रचना, पिछली शताब्दी में रचित साहित्य हो या आधुनिक साहित्य. येहाँ तक की वो आज भी लिखा जा रहा है.

मेघदूत की बात करें तो सहसा मन स्वर्गीय श्रीयुत नागार्जुन द्वारा अनुदित काव्य पर खिचा चला जाता है. इस तरह के साहित्य का सृजन न तो कभी पहले हुआ न होने की संभावना है. पर हमारे मन और हृदय में पावस ऋतू इतनी रमी हुई है की आज भी किसी न किसी रूप में उसका वर्णन हो रहा है. फिर वो चाहे भारतीय फिल्मे ही क्यूँ न हों. बात फिल्मों की हो और राजकपूर की बरसात की न हो ऐसा हो ही नहीं सकता. १९४४ में आयी ये फिल्म और उसका गाना “बरसात में हम से मिले तुम ओ सजन हम से मिले तुम ” और “प्यार हुआ इकरार हुआ” आज भी उतने ही मशहूर हैं. बिमल रॉय की फिल्म परख का गाना ” ओ सजना बरखा बहार आयी रस की फुहार लाई” अन्दर तक छु जाता है. कुछ और फ़िल्मी गीत जिनमे बरसात का ज़िक्र है मुझे याद आ रहे हैं और जो शायद सबने सुने होंगे “”ठंडी ठंडी सावन की फुहार” ,”रिमझिम के तराने ले के आई बरसात” ,”काली घटा छाए मेरा जिया तरसाये” ,”गरजत बरसत सावन आये रे” व ”ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी बरसात की रात”,”एक लड़की भीगी भागी-सी” ,”छाई बरखा बहार पड़े अंगना फुहार पिया आ के गले लग जा”, ”उमड़ घुमड़ घिर आई रे घटा” , ”जारे कारे बदरा बलम के द्वार” ,”धरती कहे पुकार के”, ”छाई बरखा बहार” ,”सावन का महीना पवन करे शोर”, ”रिमझिम के गीत सावन गाए भीगी भीगी रातों में” ,”छुप गये सारे नज़ारे ओए क्या बात हो गई”, ”कुछ कहता है ये सावन” , ”बदरा छाए झूले पड़ गए हाए” ,”मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निंदिया”, ”अल्लाह मेघ दे पानी दे छाया दे”, ”काली घटा छाये मोरा जिया तरसाये”,”रिमझिम गिरे सावन”, ”सावन के झूले पड़े”, ”भीगी भीगी रातों में”,”बादल यों गरजता है डर कुछ ऐसा लगता है”, ”रिमझिम रिमझिम रूमझुम रूमझुम”, ”पानी रे पानी तेरा रंग कैसा”, ”लगी आज सावन की फ़िर वो झड़ी है” , ”मेरे ख्वाबों में जो आए”, ”घोड़े जैसी चाल हाथी जैसी दुम ओ सावन राजा कहाँ से आए तुम” ,”आज रपट जायें”. और भी हज़ारों गीत हैं, कवितायें हैं जिनमे बरसात या सावन की खुसबू बसी हुई है… कुछ लोक गीत भी मुझे अब याद आ रहे हैं पर उनका ज़िक्र फिर कभी.

अभी बरसात का आनंद लें….गरमा गर्म चाय और पकोड़ों के साथ…

हालात ही कुछ ऐसे हैं …

Aside

पिछले २ महीने मैंने बरेली में बिताये. अपने इस प्रवास के दौरान कुछ लिखा था पर पोस्ट नहीं कर पाया। अब जबकि मुंबई आ गया हूँ -जो कुछ पहले पोस्ट नहीं कर पाया ,अब कर रहा हूँ.

बरेली में सब कुछ वैसा ही है. जैसा पहले था. कुछ नहीं बदला है और न बदलने की उम्मीद है. बिजली जैसे पहले आँख मिचोनी खेलती थी उसमे ज़रूर बदलाव आया है. पहले आती जाती थी. अब जाती है तो लौट कर आये ना आये कुछ पता ही नहीं रहता. दिन की १२ घंटे की घोषित कटौती तो है ही, बाकी समय अघोषित कटौती. लोग बाग़ अब अपने हाल या इस कटौती के आदि हो गए हैं. गरमी बे इन्ताह है. इन्वेर्टर के आ जाने से हाथ से चलने वाले पंखे जो गायब से हो गए थे, एक बार फिर दिखने लगें हैं. इन्वेर्टर को भी चार्ज होने को बिजली की ज़रुरत है. जब बिजली ही नहीं है तो बेचारे इन्वेर्टर भी क्या करें. अपना रोना शुरू कर देते हैं. थोड़ी देर बीप की आवाज़ आती है और वो भी बंद. अब बिजली के जाने पर कोई भी परेशान नहीं होता. बिजली अगर आ जाए तो ज़रूर लोग अचंभित हो जाते हैं और चेहरों पर परेशानी की लकीरें उभर आती हैं. जिस रूटीन के आदि हो चुके हों उसमे ज़रा भी बदलाव हो तो ऐसा होना स्वाभाविक ही है.

ये बात तो रही बिजली की. पानी भी बड़ी मुश्किल से मिल पाता है. वैसे इस गंगा जमुनी मैदान में पानी की कोई कमीं नहीं है, पर पहले जो कुँए थे या खच्चर पम्प थे वो बिजली के आगमन से करीब २० वर्ष पहले गायब हो गए. बिजली से चलने वाले पम्प जो लग गए. अब फिर से लोग उसी युग में वापसी की तय्यारी में लग गए हैं. बाज़ार में जाने पर हैण्ड पम्प की दुकानों पर बड़ी भीड़ देखने को मिल रही है. दुकानदारों के चेहरों पर मुस्कराहट लौट आयी सी लगती है.

खजूर के पत्तों से बिने हाथ के पंखे भी बाज़ार में भरे पड़े हैं. लोग अपनी अपनी पसंद के पंखे खरीदने को टूटे पड़ रहें हैं. मिटटी के बने घड़े भी कुम्हार घर घर जाकर बेच रहें हैं. गर्मी से बचने को लोग सुबह सुबह बाज़ार जाते हैं, साथ में लाते हैं ककड़ी, खरबूजा, फालसा, बेल, तरबूज, खीरा आदि. मुझे अच्छी तरह याद हैं बचपन में हमारे यहाँ दो तीन तरबूज एक कपडे में लपेट कर एक रस्सी के सहारे आँगन के एक कोने में बने कुँए में सुबह लटका देते थे. शाम को करीब ३-४ बजे निकाले जाते और फिर काट कर हम लोग उन ठन्डे तरबूजों का आनंद लिया करते. आम के आने पर वो भी इसी तरह कुँए में लटका दिए जाते. अब तो कुँए हैं ही नहीं.

ये सब देख कर लगता है की हम फिर उसी समय में लौट रहें हैं. हो सकता है ४-५ वर्षों में समय हमें काफी पीछे ले जाए. सोचता हूँ इस सबका जिम्मेवार कौन है. उ सिर्फ और सिर्फ हम लोग. सरकार या प्रशासन को कोसना ठीक हो मगर इंसान ही इस सब के लिए उत्तरदायी है. प्रकर्ति को खूब रौंदा हैं इंसानों ने और भरपूर उपयोग किया इन प्राकर्तिक संसाधनों का… अब रोये का होत है जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत..

हम होंगे कामयाब…

मुद्दतों के बाद आज मुंबई वी टी गया। ओल्ड लेडी ऑफ़ बोरीबंदर-टाइम्स बिल्डिंग- डी एन रोड- फ्लोरा फाउंटेन से बलाड  पियर होता हुआ वापस वी टी। कुछ नहीं बदला है सिवाय नाम के। अब मुंबई सी एस टी हो गया है वी टी का नाम।  वही  भाग दौड़, वही भीड़-धक्का मुक्की-  कैनन की पाव भाजी-काला खट्टा और दुसरे ड्रिंक्स। भेलपुरी-वड़ा पाँव के स्टाल पर टूटते लोग। पहले आये दिन वहां जाना होता था-पर अब नहीं-हालांकि ललक उठती है बार बार। हिम्मत ही नहीं होती। लौटते  समय वी टी स्टेशन का वो हाल              ( परिसर)  बहुत कुछ पुरानी कहानियां याद दिला गया। कुछ पढ़ी हुई और कुछ खुद देखि हुई। जब ये हाल 1853 -1857 के बीच बना था, उस समय  के बॉम्बे की आबादी मुश्किल से 50 हजार  रही होगी। पर अंग्रेजों ने जो स्टेशन बनाया वहां आज 45-50 लाख लोग प्रतिदिन यात्रा करतें हैं। और यात्रियों  की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। हाल वही है। इस बिल्डिंग को हेरिटेज बिल्डिंग का दर्जा प्राप्त है। क्या प्लानिंग थी उन लोगों की…

कुछ लोकल देखीं- नयी लोकल  भी आ गयीं हैं। इन्हें सीमेंस के सहयोग से बनाया गया है। हर लोकल में एक डिब्बे में शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के बैठने की जगह भी है और उस आशय का एक चित्र भी बना है डिब्बे के बाहर। देखकर अच्छा लगा। पर तुरंत ही ये  ख़ुशी निराशा में बदल गयी। क्योंकि न तो प्लेटफार्म पर उस  डिब्बे के आगे रैंप  है और न ओवर ब्रिज पर। बेचारे स्टेशन में प्रवेश कैसे करेंगे -लोकल में चढ़ने की तो बात दूर। ये है हमारी प्लानिंग। डिब्बे में जो जगह उनके लिए बनाई गयी है लगता है वो भी सीमेंस ने अपने मुल्क को ध्यान में रख कर बनायी होगी। अपनी हाल की विदेश यात्रा का भी ध्यान आया। वहां पर ट्रेन में जाने के लिए ऐसे यात्रिओं के लिए विशेष रूप से ध्यान रखा गया है। लिफ्ट्स हैं प्लेटफार्म पर जाने को, ट्रेन्स का लेवल प्लेटफार्म के लेवल में है। लोकल बसों में भी आगे से चढ़ने के लिए एक रैंप है जिसका सञ्चालन ड्राईवर करता है।  व्हील चेयर  अन्दर चली जाती है। माल्स में भी जाने के लिए सारे रास्ते ऐसे हैं जिनपर ये लोग बे रोक टोक बिना झिझक आ जा सकतें हैं। शाम को लेक या पार्क जाने के लिए जहाँ सीधे सपाट रास्ते और सीढियां हैं वहीँ रैंप भी हैं। इसे देखकर लगता है की येहाँ प्लानिंग तो है ही नहीं और संवेदन शीलता तो बिलकुल नहीं…
और उस पर हम कहते नहीं थकते ” हम होंगे कामयाब”…