क्या अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है…?

हमारे कार्यालयाध्यक्ष, जिनका ज़िक्र मैं पहले भी कर चुका हूँ, दरअसल अपने पिछले विभाग में हिंदी सहायक थे. अंग्रेजी उन्हें आती ही नहीं थी और न उन्होंने सीखने का प्रयास ही किया कभी. दिल से बहुत अच्छे इंसान थे पर अपनी इस कमजोरी के कारण कभी कभी वे अपने आपको हास्यास्पद परिस्थिति में डाल लेते थे. हाँ उनका ये प्रयास ज़रूर रहता की कार्यालय में कार्यरत कर्मचारिओं के आलावा कम से कम लोग उनकी इस कमजोरी को जान पायें. जब भी कोई विसिटर ऑफिस में आता और अंग्रेजी में बोलना शिरू करता तो वे बहुत विचलित हो जाते थे. हाँ हूँ करके काम चल ही रहा था. पर एक दिन हमारे बड़े साहब के एक अमरीकी मित्र मिस्टर रेनोल्ट ऑफिस में आ धमके और लगे फर्राटे से अंग्रेजी बोलने और वो भी अपने अमरीकी लहजे में. इसके आगे उनकी हाँ हूँ चलने वाली नहीं थी ये उन्हें अच्छी तरह मालूम भी था फिर भी बोले ” विराजिये”. इस पर रेनोल्ट ने कहा ” वाट”. एक बार फिर उन्होंने कहा की “बैठिये”. रेनोल्ट ने कुछ इस लहजे में जबाव दिया” ह मन वतुर्ताकिंग “. इस पर तो वे महाशय बिलकुल चित हो गए और उनकी पेशानी पर पसीने की बूंदे झलकने लगीं. हम सभी लोग मुहं नीचा करके चुपचाप ये नज़ारा देख रहे थे. तभी इन महाशय ने धीमे से मेरा नाम पुकारा और इशारा किया. मैं तुरंत समझ गया की मुझे क्या करना है. मैंने भी अंग्रेजी में कोई डिग्री नहीं ली थी न ही अंग्रेजी भाषा पर मेरी उतनी पकड़ थी उस वक़्त. पर फिर भी मैंने रेनोल्ट को बैठने को कहा और पूछा की वो किस काम से आये थे. ” Yes sir. What can I do for you? ” रेनोल्ट ने कहा की ” See I want to meet my friend -Mr. _ who was with me in Illinios. ” . उस दिन हमारे बड़े साहब ऑफिस में नहीं थे. तो मिस्टर रेनोल्ट ये कह कर चले गए की वो फिर आयेंगे. मैंने इन महाशय को ये सब बात बता दी और ये भी कह दिया की ये मिस्टर रेनोल्ट हमारे बड़े साहब के अमरीकन मित्र हैं और इनकी पोस्टिंग आई आई टी कानपूर में हुई है और ये अब आते जाते रहेंगे. दुसरे दिन रविवार था. सोमवार को जब हम लोग ऑफिस पहुंचे तो कार्यालय का नक्शा बदला हुआ पाया. ” seating arrangement ” बिलकुल बदल गया था. कार्यालयाध्यक्ष की सीट ऐसी जगह रखी गयी थी की उन्हें बाहर तक का गेट दिखाई पड़े. कुछ समझ में नहीं आया और ना ही पूछने की हिम्मत हुई इस बारें में. इस तरह एक हफ्ता बीत गया. अगले हफ्ते सोमवार था शायद lawn के बहार लगे गेट के खुलने की आवाज़ आयी ही थी की ये महोदय तुरंत कान पर अपना जनेऊ चढ़ाकर बाथरूम में घुस गए. एक मिनट ही बीता होगा की ऑफिस में मिस्टर रेनोल्ट की एंट्री हुई. उन्हें देखते ही सारी बात समझ में आ गयी की क्यों “seating arrangement” में परिवर्तन किया गया था. मिस्टर रेनोल्ट के ऑफिस में आते ही उन्हें बड़े साहब ने अपने कमरे में बुला लिया. बाद में जब तक मिस्टर रेनोल्ट बड़े साहब से मिलकर गए नहीं, तब तक हमारे ये कार्यालयाध्यक्ष बाथरूम से निकल कर कार्यालय के बगल वाले lawn पर टहलते रहे. इसके बाद जब भी मिस्टर रेनोल्ट ऑफिस आते या और कोई एयर फोर्स का अफसर कार्यालय में आता, ये महाशय हमेशा बाथरूम में घुस जाते. ये सिलसिला काफी दिन चलता रहा. फिर इनका स्थानांतरण हो गया पर इन्होने ये कभी प्रयास नहीं किया की अपनी इस कमजोरी को दूर करें. १५ वर्ष उपरांत जब ये महाशय मुझे एक बार फिर मुख्यालय में मिले तब भी वैसे ही थे. फिर ये सेवा निवृत हो गए. सोचा होगा की चलो जान तो छूटी इस नामाकूल अंग्रेजी से. इतने वर्षों के बाद भी ऐसे अवसरों से रु बा रु उनकी विभिन्न मुद्राएँ और प्रतिक्रियाएं जब भी याद आती है तो मंद मंद मुस्कुरा लेता हूँ. . .

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