यादें …

मुंबई में घर के पीछे से रेलवे लाइंस गुज़रती है जिस पर रात दिन रेल गाडीयां दौड़ती रहती हैं. हर दो मिनट के अंतराल से ये सिलसिला चलता रहता है. कल रात नींद नहीं आने की वजह से अपने कमरे की खिडकी के पास बैठा रहा और देखता रहा दौड़ती हुई इन गाडिओं को. इनका आवागमन देखते देखते मुझे कुछ झपकी सी आ गयी और लगा की मैं भी किसी ट्रेन में बैठ गया हूँ और ट्रेन बहुत तेज़ गति से चली जा रही है. पर्वतों , नदी-नालों, जंगलों , शहरों और गाँवों को पार करती हुई. फिर कई दिन की यात्रा के बाद, मैं एक छोटे से स्टेशन पर उतर गया हूँ. कुछ कुछ जानी पहचानी सी जगह लगती है. स्टेशन मास्टर के कमरे से हिलती हुई एक लालटेन, कम्बल ओढ़े एक दो खलासी, २-३ कुत्ते एक दुसरे में सिमट कर सोये हुए, दूर यार्ड में एक आवारा सा खड़ा हुआ अकेला डब्बा और कुछ और दूर पे टिमटिमाती एक सिग्नल की रौशनी. सारा स्टेशन एकदम सुनसान है. किसी खलासी ने पूछने पर बताया की इस स्टेशन पर रात में सिर्फ एक ट्रेन आती है और वो चली गयी, अब अगली ट्रेन कल दोपहर को आएगी. स्टेशन मास्टर ने भी अपना कमरा अन्दर से बंद कर लिया और जो एक दो खलासी थे वो भी कहीं दुबक गए. एक दो केरोसिन लेम्प्स जो प्लेटफ़ॉर्म पर जल रहे थे उनका भी तेल समाप्त हो चला था. अब सिर्फ मैं अकेला था स्टेशन पर. शमशान जैसी शांति थी जो कभी कभी कुत्तों की कुनमुनाहट से भंग हो जाती थी.

मुझे लगा की मैं अपने बचपन में लौट गया हूँ. उम्र होगी येही ९-१० साल. एक खाकी निकर और सफ़ेद कमीज़ पहने. जेब में हाथ डाला तो सिर्फ एक इकन्नी हाथ आयी. इकन्नी को देखते ही सब कुछ याद आ गया. हम उन दिनों एक छोटे से कसबे गुन्नौर में रहते थे. बबराला से दूर ये एक तहसील थी. कसबे के एक किनारे पर पोस्ट ऑफिस था और दुसरे किनारे पर थी तहसील. सिर्फ एक ही सड़क थी जो दोनों किनारों को जोडती थी. आबादी के नाम पर कुछ ७००-८०० घर ही थे जिनमे से अधिकतर मुसलमानों के थे और कुछ हिन्दुओं के. विभाजन के बाद आये कुछ पंजाबी भी आकर बस गए थे. मैं, मेरे पापा, मेरी माँ, एक भाई और एक बहिन बस इतने ही लोग थे घर में. एक बड़ा सा घर था. बीच आँगन में था नीम का पेड़. बिजली थी ही नहीं. शाम को ४-५ बजे लालटेन आदि साफ़ की जाती, उनमे तेल भरा जाता और बत्तियां काट कर गोल की जाती थी. ये रोज का कार्यक्रम था. मुसलमानों की बस्ती में सिर्फ दो ही घर थे हिन्दुओं के. एक हमारा और एक पाकिस्तान से आये एक परिवार का. पर कभी ये महसूस नहीं हुआ की हम उनके बीच अकेले हैं. पड़ोस में अनीस मियां का घर था, उनके बच्चे बशारत, जहाँआरा, रईस और अनवर और पंजाबी परिवार की लड़की कुंती, जो उम्र में मुझ से कुछ बड़ी थी, सारे दिन हमारे ही घर पर अपना समय बिताते थे. उनके घरों में हम सबका बे रोक टोक आना जाना था. सारे तीज त्यौहार ईद, होली,दिवाली सब मिलकर मनाते थे. खाना पीना करीब एक जैसा ही था. कसबे में दो ही दुकाने थी मिठाई की, एक अच्चन मिआं की दूसरी दीनानाथ की. जब भी कभी पैसे दो पैसे हाथ लगते हम सब मिलकर उनकी दूकान पर चले जाते जलेबी खाने. एक पंसारी की दूकान भी थी जिसमे सब कुछ बिकता था. दुकानदार का नाम था किशनलाल पंजाबी.शाम होते ही पास के मैदान में हम सब लोग गिल्ली डंडा खेलते और रात होने पर ही वापस आते. सुबह स्कूल जाने की तयारी. कसबे के एक छोर पर इक्के वाले मिलते थे स्कूल जाने को जो घर से करीब ७ मील दूर था. बबराला में. वहीँ पर रेलवे स्टेशन भी था. घर से जाते समय एक इकन्नी मिलती थी. उसमे से २ पैसे अहसान मियां जो इक्का चलाते थे को देता और बचे हुए २ पैसे स्कूल के सामने की हलवाई की दूकान से कुछ लेकर खा लेता था. इन २ पैसों की खातिर ७ मील पैदल घर वापस जाता था. खेतों में से होकर जहाँ तरह तरह की फसलें उगा करती. मटर के दिनों में ताज़ी मटर तोड़ कर खाते हुए चला जाता था. घर पहुँचते पहुँचते देर हो जाया करती थी. कभी कभी डांट भी पड़ती. पर मुझे २ पैसे जो प्यारे थे, डांट खा लेता. करीब ५ मील की दूरी पर गंगा नदी थी जहाँ गंगा स्नान पर मेला लगता था. हम सभी लोग मेले में बैलगाड़ी पर सवार होकर जाते थे. वहीँ गंगा के रेतीले तट पर टेंट लगाके २-३ दिन रहने का प्रोग्राम बना करता था हर वर्ष. रात में चांदनी रात में गंगा तट का रेतीला मैदान ऐसा लगता की जैसे किसीने चांदी की चादर बिछादी हो. ऊपर झिलमिल करते तारे और टेंटों में जलती हुई लालटेन. रेत पर जलते हुए चूल्हे और गाते हुए लोग. ढोलक और मजीरे की धुन पर नाच गाना और लोक गीत. सब कुछ इतना रोमांच पूर्ण लगता था की हम किसी नयी दुनियां में आ गए हो. सुबह होती, स्नान होता, बाज़ार लगते, मिटटी के खिलोने बिकते, लोहार भी अपनी बनाई हुई चीज़ें लेकर आते. शाम होती, फिर अँधेरा, फिर वही रात का गाना बजाना. ३ दिन बाद वापस लौटने की तयारी. सुब कुछ कितना अच्छा लगता था. अगले साल की प्रतीक्षा रहती थी. घर लौटकर फिर वही दिनचर्या. गर्मी आते ही हम लोग अपनी ननिहाल जाते थे. खूब आम खाते, घुमते, खेतों में जाते और सारे दिन हूद्दंग किया करते. इसी तरह बचपन बीत गया. परिवार बड़ा था. अभाव तो था पर कमी कभी महसूस नहीं हुई. आपस में बड़ा प्रेम था, एक दुसरे के दुःख सुख में हमेशा साथ रहे. करीब ५ साल हम लोग वहां रहे.

वो जो दिन थे भुलाए नहीं भूलते. कहीं न कहीं वो याद्दें दफ़न हैं दिल के किसी कोने में. जब भी कभी मन विचलित होता है उन यादों की डगर पर लौट जाता हूँ. शायद येही कारण रहा होगा की रेल गाडी मुझे अपने आप उस जगह ले गयी जहाँ मैंने अपने बचपन के कुछ दिन बिताये थे. आज सब कुछ है ज़िन्दगी में पर वो बचपन नहीं है…

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