एक और मजेदार घटना.

कुछ समय बाद गाडी ठीक होकर आ गयी. एक दिन मैं कहीं बाज़ार में था. पीछे से एक कार मेरे पास आकर रुक गयी. देखा तो साहब चला रहे थे. मुझसे बोले की ” तुम गाडी में बैठो”. में पहले झिज्का फिर गाड़ी का अगला दरवाज़ा खोल कर, अगली सीट उठाकर, पीछे जाकर बैठ गया. साहब के बगल में बैठने की हिम्मत ही नहीं थी. गाडी चल पड़ी. करीब १ किलो मीटर गयी होगी, तभी साहब ने गाडी रोक दी. और जोर से बोले”तुम आगे आकर बैठो. मैंने फिर सीट आगे झुकाई और उनके कहे अनुसार आगे बैठ गया. हुकुम जो था और हुकुम उदूली सरकारी सरविस में कोई कर ही नहीं सकता. गाडी फिर चली फिर साहब मुझसे बोले ” तुम जान भूझ कर पीछे बैठे होगे ताकि मैं शोफर लगूं”. मैंने कहा की ऐसा न तो मुझे मालूम था न ही मेरी मर्ज़ी ऐसी थी. फिर मैंने भी हिम्मत करके कह ही दिया की अगर आपको ऐसा लगा तो आप पहले ही कह देते जब मैं पीछे बैठ रहा था. साहब इस बार चुप रहे. कारण बाद में मालूम पड़ा की मेरे गाडी के अल्प ज्ञान के बारें में उन्हें मालूम पड़ गया था और वो ये नहीं चाहेते थे की भविष्य में जब कोई मुसीबत पड़े तो कम से कम वो मुझसे कुछ मदद की उम्मीद रख सकें.

कुछ दिन बाद गाडी फिर खडी हो गयी. मेकेनिक को बुलाया गया और मुझे कहा गया की मैं भी देखू की मेकेनिक क्या कर रहा है. उसने बोनेट खोला ही था की साहब आकर फिर खड़े हो गए. मेकेनिक थोड़ी देर देखता रहा फिर बोला की ये “कोल” जल गया है. मैंने कहा की “कॉइल” जला होगा. मेकेनिक के बोलने से पहले ही साहब बोले की मेकेनिक जब “कोल” कह रहा है तो सही कह रहा है उसे करने दो. दरअसल साहब भी जानते थे की ठीक शब्द “कॉइल” ही है पर वो किसी भी तरह के पचड़े में नहीं पड़ना चाते थे की कहीं मेकेनिक काम छोड़ कर न चला जाये. इस सबके चक्कर में उन्हें अक्सर झुन्ज्लाहट हो जाती थी और वो बगर कुछ सोचे समझे उल्टा सीधा बोल देते थे. हम लोग भी काफी परेशां थे जबसे ये गाडी आयी थी रोज़ कुछ कुछ होता रहता था.

फिर एक दिन उन्होंने यकायक गाडी बेच दी ढाई हजार रुपये में. ऑफिस का माहोल काफी कुछ हद तक सुधर गया.

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