बात की गहराई को नापें…

आजकल जब भी फुर्सत होती है, कुछ न कुछ पुराना पढने को मिल जाता है घर में दबे पुराने सामानों के बीच. एक बहुत पुरानी हिंदी की टेक्स्ट बुक मिली जो शायद मैंने कभी ८-९ वि. में पढ़ी होगी. पन्ने पलटने पर कल कबीर के कुछ दोहे मिले थे. आज रहीम द्वारा रचित दोहों से रूबरू हुआ. जब पढता था तो सोचता था की ये लोग बेकार में इतना लिख कर छोड़ गए और पढना हमें पड़ रहा है . कारण था की इनको समझ पाना बड़ा मुश्किल लगता था. पर अब समझ में आया की जो भी ये महान लोग लिख कर छोड़ गए उसका एक एक शब्द ज़िन्दगी की सचाई बयां करता है और बहुत ही सारगर्भित है. ४००-५०० वर्ष पहले लिखा ये साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक और सम्यक है जितना उस समय उन्होंने महसूस करके लिखा होगा. येहाँ पर कुछ रहीम के दोहे प्रस्तुत कर रहा हूँ. आप भी पढ़े और कही गयी बात की गहराई को नापें.

छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होय॥

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥

जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥

आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि॥

खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक लगाय।
रहिमन करुये मुखन को, चहियत इहै सजाय॥

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥

जे गरीब पर हित करैं, हे रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥

बड़े काम ओछो करै, तो न बड़ाई होय।
ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहे न कोय॥

माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥

एकहि साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचबो, फूलहि फलहि अघाय॥

रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि..

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।
सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥

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