बरेली और गोलगप्पे…

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बरेली और गोलगप्पे.

ये तो नहीं पता की गोलगप्पे की इजाद किसने और कब की पर सारे भारत में इसे पसंद किया जाता है. उत्तर भारत में ये गोलगप्पा, मध्य भारत में गुपचुप, बंगाल में पुच्की, पश्चिम भारत में पानी पूरी, कहीं कहीं पानी के बताशे के नाम से जाना जाता है. पर मिलता हर प्रदेश में है अपने चटपटे, तीखे और इमली के पानी के साथ. अब तो विदेश में भी उपलब्ध है जहाँ उसकी मार्केटिंग हल्दीराम, बीकानेरवाला, गार्डेन जैसी कंपनियां कर रही हैं. अच्छे स्टार रटिंग वाले रेस्तोरंट्स में भी लोग इसे रखने लगे हैं. पर जो मज़ा इसे खाने का उत्तर भारत में है वो कहीं नहीं. फिर चाहे वो जगह दिल्ली की चांदनी चौक, बंगाली मार्केट,तिलकनगर हो, लखनऊ का अमीनाबाद हो या कैसरबाग़, बनारस का मधुर जलपान हो या बांस फाटक, जयपुर का तिर्पोलिया चौक हो या स्टेशन रोड, इलहाबाद का खुल्दाबाद हो या गंगा किनारे की कोई जगह, उदय पुर की पिछोला झील हो या शहर का कोई अंदरूनी हिस्सा हर जगह इसके दर्शन हो ही जायेंगे. पर बरेली में इसका बहुत अधिक प्रचलन है. किसी भी गली से निकल जाएँ आप किसी भी वक़्त, सुबह हो या शाम, हर समय लोग इसका लुफ्त उठाते मिल जायंगे. बरेली में जिसको कोई काम नहीं मिलता, लगता है वो गोलगप्पे बेचने लगता है. ना कोई ज्यादा पूंजी की ज़रुरत न कोई रिस्क. सिर्फ एक अदद घड़ा, एक ठेला, एक कटोरदान, कुछ दौने, ४-५ पकेट गोलगप्पे जो एहां घर घर बनते हैं. और हाँ थोडा इमली का पानी बना लिया,बस. काम शुरू. ग्राहकों की कोई कमी नहीं. कहीं भी किसी भी समय गोलगप्पे खाने वाले मिल ही जाते हैं. हाँ शाम के समय इसे खाने का या पीने का अलग ही मज़ा है. इसका आनंद लेने का भी एक अलग सा रिटुअल है. शाम हुई और लोग न जाने कहाँ से आ जाते हैं बाज़ार में इसका लुत्फ़ उठाने. सड़क के किनारे लगे ठेलों पर लोगों की, विशेषकर लड़कियों और महिलाओं की, भीड़ लग जाती है. खुद खाने का जो आनंद है उससे ज्यादा आनंद दूसरों को खाते हुए देखने में भी है. ४-५ लड़कियां खा रही हैं और इतनी ही लगभग अपनी बारी के इंतज़ार में हैं एक या किसी भी ठेले पर. गोलगप्पे वाला पहले सबको एक एक दौना देता है. लड़कियां पहले से ही अपने रूमाल को पकडे हुए तयार हैं. गोलगप्पे वाला अपने ग्राहकों की संख्या के अनुसार गिन कर गोलगप्पे निकाल कर एक थाली में रखता है. फिर उसमे से एक गोलगप्पा बड़े प्यार और नाजुकता से उठाता है और लडकियों की तरफ देखता है. उससे पहले की वो कुछ पूछे लड़कियां अपने आप बोलने लगती हैं. भैया मेरे वाले में आलू डालना, दूसरी कहती है की मेरे में चने, तीसरी कहेगी की मेरे में मूंग और मीठी चटनी फिर सिलसिला शुरू. ठेले वाला पहले अंगूठे से गोलगप्पे में एक छेद करता है, आलू भरता है और फिर घड़े में हाथ डालकर पानी भरता है और पहली ग्राहक को देता है दौने में. लड़की उठा कर उसे अपने मुह में रखती है और धीमे से मुह बंद करती है. जब वो मुह में फूटता है तो लगता है की वो तृप्त हो गयी हो. बाकी लड़कियों के मूह में अपने आप पानी आ जाता है गोलगप्पे के इंतज़ार में. अब गौर से देखिये तो पता चलेगा की जैसे जैसे गोलगप्पे वाले के हाथ चलते हैं लड़कियों की निघाहे भी चलती है. गोलगप्पे वाला गोलगप्पा घड़े में दाल रहा है, अब हाथ बहार निकला, दूसरी ग्राहक के दौने में रखा, उसने खाया. ये सिलसिला लाइन के ख़त्म होने तक चलता है. हर लड़की गोलगप्पे का अपने दौने में आने का इंतज़ार करती है. और तभी उसकी निघाहे चलना बंद होती हैं जब गोलगप्पे मियां उसके दौने में बिराजमान. इस बीच कई बार गोलगप्पा मुह में रखने से पहले ही फूट जाता है. ये अक्सर जब होता जब उसे मुह में रखते समय उस लड़की की नज़र किसी और से मिल जाये या उसे महसूस हो की कोई उसे देख रहा है. मुह से बहता पानी कभी दुपट्टे पर कभी साडी पर से बहकर अपनी जगह बनाता हुआ अन्दर तक चला जाता है. कई बार रुमाल निकालने से पहले ही ये काम हो जाता है. वो नज़र उठा कर देखती है की कितने लोगों ने उसके मुह में जाने से पहले गोलगप्पे को फूटते देखा. ये ज़रूरी नहीं की ये सिर्फ लड़कियों के साथ घटित हो, यदा कदा पुरुषों के साथ भी ऐसा हो जाता है. खाते समय तरह तरह के भाव उमड़ते हैं और चेहरे की मुद्राएँ किस तरह से बदलती हैं इसका वर्णन करना येहाँ मुश्किल है पर आप कल्पना कर सकते हैं की गोलगप्पा अपने आप में एक नायाब चीज़ है. और इसके खाने का भी एक अंदाज़ है. बनाने वाले ने कभी सोचा भी नहीं होगा की वो क्या चीज़ बना रहा है…….शेष फिर कभी..

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