साइकिल वही है पर वक़्त ने करवट ली है…

आर्यन की आठवीं वर्षगाँठ पर ऊसकी नयी साइकिल आ गयी.  हम लोगों ने साइकिल की पूजा की और आर्यन को  तिलक लगाया.  उसका उत्साह और प्रसन्नता देखते ही  बनती है.

ये सब देखकर मुझे अपनी साइकिल की याद आ गयी. उन दिनों हम लोग अलीगढ में रहते थे. मेरी उम्र येही कोई ४-५ वर्ष रही होगी. पड़ोस के एक दो बच्चों के पास तिपहिया  साइकिल को देख मेरा  मन भी उसे चलाने को होता. घर में अपनी माँ को कहा भी पर कई महीने तक मेरी साइकिल नहीं आयी. फिर एक दिन मैंने खाना भी नहीं खाया और कहा की मैं तब  तक नहीं खाऊंगा जब तक साइकिल नहीं आ जाती. उस दिन पहली बार मेरी माँ ने बताया की साइकिल खरीदने को बहुत पैसे लगते हैं और हमारी ऐसी परिस्थिति नहीं है की हम उसे खरीद सकें. घर का गुज़ारा ही मुश्किल से चलता है. महीने के आखिर में अखबार की रद्दी बेचनी पड़ती है तब कहीं जाकर सब्जी इत्यादि आ पाती है. ये बात कुछ समझ आयी कुछ नहीं. साइकिल की ललक बरक़रार रही,हालाँकि जिद में कमी ज़रूर आ गयी. इस बात को कई महीने बीत  गए.
फिर एक दिन मेरे पापा किसी काम से दिल्ली गए और देर रात तक वापस आये. तब तक मैं सो चुका था. सुबह जब उठा तो अपने बिस्तर के पास एक नयी साइकिल को देख बहुत खुश हुआ. मुझे उस पर बिठाया  गया . मैं  बहुत उत्साहित था और खुश भी की चलो मेरी साइकिल भी आ गयी. पैडल पर पाँव रखकर चलाने की कोशिश की पर पैर साइकिल के हेंडल  में जाकर टकराने लगे. पापा को बहुत बुरा लगा. कुछ देर वो बड़े असमंजस में रहे और फिर माँ से बोले की साइकिल कुछ छोटी आ गयी है उसे वापस दिल्ली से बदल कर लाना होगा. माँ परेशान थी और मैं भी. परेशानी के कारण ज़रूर अलग रहे होंगे. उसी समय पापा साइकिल लेकर दिल्ली के लिए निकल पड़े. मुझे उनकी परेशानी का ज़रा भी अहसास नहीं था. मुझे तो सिर्फ अपनी साइकिल से मतलब था. माँ ने बताया की पापा रात को ही २ बजे साइकिल लेकर दिल्ली से लौटे थे और इतने सुबह फिर दिल्ली चले गए साइकिल बदलने. उन्होंने ये भी बताया की दिल्ली दोबारा आने जाने के लिए मकान मालिक से कुछ रूपये उधार लेकर गए हैं. शाम तक पापा साइकिल लेकर आ गए. और मेरी प्रसन्नता की सीमा न रही. मै आँगन में साइकिल चलाता रहा और पापा और अम्मा दोनों कमरे में चुप चाप बैठे थे. आज सोचता हूँ तो लगता है की वो खुश रहकर भी अपनी ख़ुशी व्यक्त क्युओं  नहीं कर पाए होंगे तब. मुफलिसी थी और मै था नासमझ…

उस बात को ६० वर्ष गुज़र चुकें हैं पर आज भी मुझे ऐसा लगा की मैं अपने उसी अलीगढ के मकान में हूँ और पापा और अम्मा  कमरे में चुपचाप बैठे हैं…साइकिल वही है पर वक़्त ने करवट ली है…

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4 thoughts on “साइकिल वही है पर वक़्त ने करवट ली है…

  1. आर्यन की साइकिल तो छा गई! बचपन की यादें … सचमुच बहुत लम्बा सफ़र तय हो गया है तब से अब तक। शुभकामनायें!

    • सही कहा आपने अनुराग जी…जीवन में घटी कुछ घटनाएं हमेशा याद रहती हैं…

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