भागती हुई ज़िन्दगी और कोलावेरी डी…

जब सुबह उठा तो सूरज निकले करीब २ घंटे से ज्यादा बीत चुके थे. खिड़की से जो पक्षिओं की आवाजें आती हैं कभी कभी, वो भी धूमिल पड़ चुकीं थीं. हाँ आकाश में ज़रूर एक फ्लामिन्गोस का झुण्ड उड़ता चला जा रहा था. अबकी बार ये प्रवासी पक्षी देर से आयें हैं और उनकी तादात भी कम है. पिछली साल लोगों ने उनका बेरहमी से शिकार जो किया था, इसीलिए शायद.

लोग न जाने कैसे इतने सुन्दर और मासूम प्रवासी फ़्लमिन्गोस को बेदर्दी से मारते हैं सिर्फ अपनी तश्तरी सजाने को. बचपन में जब मैं अपने गाँव में था तो रात को गर्मी के मौसम में अक्सर आँगन में नीम के पेड़ के नीचे सोता था. सुबह जब भी ४-५ बजे आँख खुलती तो ये प्रवासी पक्षी झुण्ड बनाके एक के पीछे एक उड़ते चले जाते थे और नीचे तक उनके बोलने के आवाजें आया करती थीं. कई बार तो रात को चंद्रमा की रौशनी में भी इस तरह के झुण्ड बहुत उंचाई पर उड़ते हुए दिखाई दे जाते  थे. सुबह होती तो नीमके पेड़ पर विविध प्रकार के पक्षी आकर बैठ जाते. जितने अलग प्रकार के पक्षी उतनी ही अलग प्रकार की उनकी चहचाहट. कानों में पड़ती तो लगता कह रहें हों की अब तो उठो भाई दिन निकल आया है. नील कंठ-मैना-तोते-बुलबुल-गौरया और न जाने कितने प्रकार के पक्षी, लगता है जैसे अब खो से गएँ हैं.

बिस्तर छोड़ते, माँ के पाँव छूते, जो उस समय चुल्हा जला रही होतीं, और बाहर निकल जाते. दूध वाला अपनी गायें लेकर खुद ही दरवाज़े पर आता और दूध निकालता. गरमा गर्म झाग वाला ढूध जो अब हमारी संतानों को भी नसीब नहीं है. थैली जो आने लगी है. शायद आजकल के बच्चों ने “ग से गाइ ” सिर्फ अपनी पुस्तक में ही देखी हो. कम से कम इस महानगर में तो गाइ भैंस के दर्शन ही नहीं होते और ना ही गौरया के. कोई जानता तक नहीं की इस नाम की भी कोई चिड़िया होती हैं.

अब अगर है तो मशीन की तरह दौड़ता आदमी, कारें और बसें, जनरेटर की आवाजें , थके हुए अनजान चेहरे, भागती हुई ज़िन्दगी, शोर करते टीवी…और कोलावेरी डी …

सब कुछ कितना बदल गया है…

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