Evergreen ” Dev Saheb”…

आज देव साहब को गए एक वर्ष हो गया। पर वो आज भी हमारे दिलों में बसते  हैं। पिछले वर्ष उनके निधन के बाद मैंने कुछ पोस्ट्स येहाँ  फेस  बुक पर लिखी थी। उनकी भी याद आ गयी। ये रही —
“देव साहब नहीं रहे. सुनकर बहुत ख़राब लगा और यकीन ही नहीं हुआ. विशेषकर इसलिए भी की जबसे होश संभाला, उम्र देव, राज और दिलीप की फ़िल्में देखते ही बीती. एक ज़माना था जब इन्ही तीनों की तूती बोलती थी बॉक्स ऑफिस पर. इंतज़ार रहता था इनकी फिल्मों का. इन तीनों में सबसे जिंदा दिल और खूबसूरत देव साहब ही थे और उनकी फिल्मों का एक अलग अंदाज़ था जो दर्शकों को बरबस सिनेमा हाल पर खींच लाता था. जहाँ तक मुझे याद है मैंने देव साहब की पहली फिल्म “काला बाज़ार” देखी थी. उस समय मैं दसवीं में था. फिल्म क्या देखी, एक जूनून सा सवार हो गया दिल और दिमाग पर. उनकी पिछली फ़िल्में और आगे आनी वाली लगभग सभी फिल्मे देखी. सी आई डी, काला पानी, पईंग गेस्ट, असली नकली, हम दोनों, तेरे घर के सामने, तीन देवींयां , हरे रामा हरे कृष्णा, गाइड, जोनी मेरा नाम एक से एक बढ़कर फिल्म्स थीं जिनमे देव साहब की ऊर्जा और उनका अनोखा अंदाज़ देखते ही बनता था. उसकी बाद की फिल्म्स नहीं देखी क्यूंकि उम्र के साथ साथ फिल्मों पर या तो उनकी पकड़ कम होती चली गयी या फिर नयी पीढ़ी का नज़रिया. जो भी हो, देव साब वाकई देव साब थे. इतनी उम्र तक भी जूनून की हद तक सिनेमा से जुड़े रहे बगैर बॉक्स ऑफिस की परवाह किये. कल टीवी पर उनके ही गाने चलते रहे और याद दिलाते रहे उनकी और उनकी फिल्मों को देखते बीती अपनी जवानी की. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे.”
“कल शाम टी वी पर चैनल बदलते बदलते ऐसे ही एक म्यूजिक चैनल पर रुक गया. देव साहेब के गीत आ रहे थे. एक एक से एक बढ़कर श्वेत एवेम श्याम फिल्मों के दौर के गीत. गाने सुनते सुनते उस पुराने और सुरीले वक़्त में पहुँच गया. सी आई डी, असली नकली, माया, तेरे घर के सामने, मंजिल, जब प्यार किसी से होता है, हाउस नंबर ४४, फंटूश, मुनीमजी, नौ दो ग्यारह, टक्सी ड्राईवर, काला पानी, काला बाज़ार, बात एक रात की, हम दोनों, बम्बई का बाबू, तीन देवियाँ जैसी फिल्मों के गीत. क्या वक़्त था उस सुरीले दौर का जब न सिर्फ संगीत बल्कि गीतों के बोल भी अत्यंत सुन्दर थे. देव साहेब के जवानी के दिन ,उनका अनोखा अंदाज़, उनकी हेरोइने उनके पहनने ओढने का तरीका एक सच्चे और सौम्य रोमांस की याद दिलाता रहा. पता ही नहीं चला कब रात के १२ बज गए. मगर उसके बाद भी वो सफ़र जारी रहा रात भर. दूर कहीं से उन गीतों की स्वर लाहिरी सुनायी देती रही. सुबह उठा तो पास वाले फ्लैट से कोलावेरी डी … की आवाज़ आ रही थी. आज कल की पीढ़ी क्या जाने उन्होंने क्या खोया या क्या नहीं पाया. समझाना मुश्किल है..”
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