हालात ही कुछ ऐसे हैं …

पिछले २ महीने मैंने बरेली में बिताये. अपने इस प्रवास के दौरान कुछ लिखा था पर पोस्ट नहीं कर पाया। अब जबकि मुंबई आ गया हूँ -जो कुछ पहले पोस्ट नहीं कर पाया ,अब कर रहा हूँ.

बरेली में सब कुछ वैसा ही है. जैसा पहले था. कुछ नहीं बदला है और न बदलने की उम्मीद है. बिजली जैसे पहले आँख मिचोनी खेलती थी उसमे ज़रूर बदलाव आया है. पहले आती जाती थी. अब जाती है तो लौट कर आये ना आये कुछ पता ही नहीं रहता. दिन की १२ घंटे की घोषित कटौती तो है ही, बाकी समय अघोषित कटौती. लोग बाग़ अब अपने हाल या इस कटौती के आदि हो गए हैं. गरमी बे इन्ताह है. इन्वेर्टर के आ जाने से हाथ से चलने वाले पंखे जो गायब से हो गए थे, एक बार फिर दिखने लगें हैं. इन्वेर्टर को भी चार्ज होने को बिजली की ज़रुरत है. जब बिजली ही नहीं है तो बेचारे इन्वेर्टर भी क्या करें. अपना रोना शुरू कर देते हैं. थोड़ी देर बीप की आवाज़ आती है और वो भी बंद. अब बिजली के जाने पर कोई भी परेशान नहीं होता. बिजली अगर आ जाए तो ज़रूर लोग अचंभित हो जाते हैं और चेहरों पर परेशानी की लकीरें उभर आती हैं. जिस रूटीन के आदि हो चुके हों उसमे ज़रा भी बदलाव हो तो ऐसा होना स्वाभाविक ही है.

ये बात तो रही बिजली की. पानी भी बड़ी मुश्किल से मिल पाता है. वैसे इस गंगा जमुनी मैदान में पानी की कोई कमीं नहीं है, पर पहले जो कुँए थे या खच्चर पम्प थे वो बिजली के आगमन से करीब २० वर्ष पहले गायब हो गए. बिजली से चलने वाले पम्प जो लग गए. अब फिर से लोग उसी युग में वापसी की तय्यारी में लग गए हैं. बाज़ार में जाने पर हैण्ड पम्प की दुकानों पर बड़ी भीड़ देखने को मिल रही है. दुकानदारों के चेहरों पर मुस्कराहट लौट आयी सी लगती है.

खजूर के पत्तों से बिने हाथ के पंखे भी बाज़ार में भरे पड़े हैं. लोग अपनी अपनी पसंद के पंखे खरीदने को टूटे पड़ रहें हैं. मिटटी के बने घड़े भी कुम्हार घर घर जाकर बेच रहें हैं. गर्मी से बचने को लोग सुबह सुबह बाज़ार जाते हैं, साथ में लाते हैं ककड़ी, खरबूजा, फालसा, बेल, तरबूज, खीरा आदि. मुझे अच्छी तरह याद हैं बचपन में हमारे यहाँ दो तीन तरबूज एक कपडे में लपेट कर एक रस्सी के सहारे आँगन के एक कोने में बने कुँए में सुबह लटका देते थे. शाम को करीब ३-४ बजे निकाले जाते और फिर काट कर हम लोग उन ठन्डे तरबूजों का आनंद लिया करते. आम के आने पर वो भी इसी तरह कुँए में लटका दिए जाते. अब तो कुँए हैं ही नहीं.

ये सब देख कर लगता है की हम फिर उसी समय में लौट रहें हैं. हो सकता है ४-५ वर्षों में समय हमें काफी पीछे ले जाए. सोचता हूँ इस सबका जिम्मेवार कौन है. उ सिर्फ और सिर्फ हम लोग. सरकार या प्रशासन को कोसना ठीक हो मगर इंसान ही इस सब के लिए उत्तरदायी है. प्रकर्ति को खूब रौंदा हैं इंसानों ने और भरपूर उपयोग किया इन प्राकर्तिक संसाधनों का… अब रोये का होत है जब चिड़ियाँ चुग गयी खेत..

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s