अमवा की डाली बोले काली कोयलिया -आजा बलमवा हमार आजा बलमवा हमार’…

अमवा की डाली बोले काली कोयलिया -आजा बलमवा हमार आजा बलमवा हमार’…

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आजकल बाज़ार तरह तरह के आमों से पटे पड़े हैं. अल्फांजो,दसेरी,सफेदा,लंगड़ा,बादामी,चौसा, तोतापरी और न जाने कितनी ही किस्मों के आम. भारत तो वैसे ही आम का जन्मदाता है, सारी दुनियां में आम यहीं से गया फल और उसके पौधों के रूप में. केरल से लेकर हिमालय के घाटिओं और पूर्व से पश्चिम तक इस फल की अनेक प्रजातियाँ देखने को मिलती हैं. कहते हैं सब मिलाकर इसकी १४०० किस्में हैं.

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भगवान् गणेश के हाथ में जो आम है वो संपूर्ण संतुष्टि का प्रतीक है. भगवान् बुध को ज्ञान प्राप्ति भी आम के पेड़ के नीचे ही हुई थी. जैन धर्मं में भी देवी अम्बिका को एक आम के पेड़ के नीचे ही बैठे दिखाया जाता है. कालिदास द्वारा ४ थी शताब्दी में रचित साहित्य में भी आम का वर्णन है. तीसरी शताब्दी और ७वि शताब्दी इसा पूर्व में इस फल का जायका सिकंदर और हुआन सांग ने भी किया ऐसा इतिहास के पन्नो में दफ़न हैं. मुग़ल सम्राट अकबर ने दरभंगा में इसके एक लाख पौधे लगाए। उस बाग़ को आज भी लाखी बाग़ के नाम से जाना जाता है।

हमारी संस्कृति में आम कुछ इस तरह रच बस गया है की जन्म से लेकर, विभिन्न रीत रिवाजों, पूजा पाठ, और जीवन के अंत तक में इसकी या इससे जुडी चीज़ की ज़रुरत पड़ती है. देवी सरस्वती और माघ के महीने में होने वाली चंद्रमा की पूजा में आम के बौर चढाने का चलन है. आम के पत्तों की बन्दनवार हर हिन्दू के घर के दरवाजे पर कुछ विशिष्ट अवसरों पर लगाई जाती है चाहे वो पोंगल हो,दीपावली हो, गणेश चतुर्थी हो सभी में इसका प्रयोग इश्वर के आशीर्वाद और शांति के द्योतक हैं. तेलगु, कन्नडा और तमिल नव वर्ष में पकने वाली “उगाडी पच्चाड़ी ” में आम के टुकड़े काट कर डालने की प्रथा है. इन्ही आम के पत्तों और लकड़ी का प्रयोग पूजा हवन आदि में होता है, शादी ब्याह इसके बगेर अधूरे हैं.

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हाथों में रची मेहँदी- सिल्क और कांजीवरम की साडिओं- कश्मीरी शाल और येहाँ तक की रंगोली तक में आम के विभिन्न डिजाईन देखने को मिलते हैं. आम चटनी, अचार, आम पापड़, आम रस, पके हुए आम और आम का पना आदि अपनी विभिन्न शैलिओं और स्वादों में किसी भी जुबां और मुहं में पानी लाने के लिए काफी हैं.

आम की लकड़ी के दरवाजे और ताबूत और येहाँ तक की अंत समय चिता की अग्नि भी आम की लकड़ी से जलाई जाती है.

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